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मन की मछरिया | Man ki Machhariya Song Lyrics | Nirmal Pathak Ki Ghar Wapsi

nirmal pathak ki ghar wapsi song



रोज़-रोज़ तड़पे मन की मछरिया
कौन मलहवा फेंके है जाल, 
खेत खललहनावा की माटी ये पूछे
कहाँ रहे इतने साल, ऐ बबुआ। 

पनघट पे कुइंया का पानी छलक जाए
घूँघट में रुपवा की रानी फिसल जाए 
भोरे-भोरे बदरा में लाली बिखर जाए 
कजरा सी कारी-कारी सांझ मगर हो रही 
लहरों में कालिमा ये नदियाँ क्यों ढ़ो रही 
सखूी तलैया बेहाल, रोज़-रोज़ तड़पे.. ।

रहिया निहारे ये पिपरा की छांव 
गौंवा की हाय गली रोके मोरा पांव 
यही पगडंडी तो जाती मेरे गांव 
रिश्तों की डोर एक दसूरे से जोड़ के 
उस पार कैसे अब जाऊं सब छोड़ के 
खंटूे बंधी अपनी नाव,रोज़-रोज़ तड़पे.. ।



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