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कवित्री का अपने माँ के प्रति प्यार | Kavitree Ka Apane Maan Ke Prati Pyaar



मुझे प्रदेश न भेज माँ
तेरी याद सताएगी
मुझ पर आकर भुक्ति है
मेरे लिए ही बहती है 

मेरी ढाल बनाकर तू 
मेरे दुख भी शहती है
फिर अपने दिल के टुकड़े को
क्यों पराई अमानत कहती है

सफेद नतो से बंधा हुआ
कुछ अलग हमारा नाता है
जिस अंग को तू छू देती है
ओ अन ही मुझको भाता है

तेरे दाल चावल के सिवा 
और खुश न खा पाऊँगी
चलना तुझने सिखाया है
तुझसे दूर न जा पाऊँगी

बुखार पर तर्पकार जब 
बिस्तर पर कड़ाउंगी
तेरी याद में जब माँ 
विकल वयाकुल हो जाउंगी

तेरे विरह में जब आँशु 
यूँ बेह जांयेंगे बंधी हुई
होठो की साड़ी कहानी कह जाएंगे

प्यार से डांटकर मेरे सर को कौन सहलायेगा
रात भर जागकर मुझे दबाई कौन खिलायेगा
तेरी मोहब्बत का अंचल सर से यूँ हट जाएगा
तेरी गड़रिया का ये बचपन क्षितिज में यूँ खो जाएगा

मैंने घर के अंचल के आँगन को रंगोली से सजाया था
अपने नन्हें हाथो से मिट्टी का घर बनाया था
और मेरे कमरे से जब हस्सी न आएगी
देख के सुने आँगन को मेरी याद न आएगी

आँशु मेरे थाम कर मुझसे यूँ लिपट जायेगी
मुझको जाता देखकर क्या तेरी छाती न फ़ट जायेगी
और तू बहोत साहसी है माँ बिन मेरे रह जाएगी
पर कमजोर ये बेटी तेरी बिन तेरे मर जायेगी

मेरी आख़री साँसे मुझतक 
छूकर तू को ही आएगी
मुझे प्रदेश न भेज माँ
तेरी याद सताएगी


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